गरीबो की दीवाली

मानवता/इंसानियत क्या होती है ?

ये बच्चे मार्केट में जहां बैठे थे, वो जगह थी पश्चिमी यूपी का अमरोहा जिला. यहां पर एक थाना पड़ता है सैद नगली.

इसी सैद नगली में ये बच्चे अपनी दुकान लगाए हुए थे. इसी दौरान पुलिस का एक गश्ती दल पहुंचा.

दुकानदारों में अफरा-तफरी जैसी हालत हो गई. पुलिसवाले आए और दुकानदारों से एक लाइन से दुकानें लगाने को कहा, ताकि लोगों को दिक्कत न हो और ट्रैफिक भी चलता रहे.

दुकानदार अपनी दुकानें समेटकर किनारे लगा रहे थे. इन दोनों बच्चों ने भी पुलिसवालों की बात मानने की कोशिश की. इसी दौरान पुलिस का ये दस्ता उन बच्चों के पास भी पहुंच गया. उन बच्चों में मायूसी तो पहले से थी, पुलिस को देखकर रहा-सहा उत्साह भी जाता रहा.

लेकिन फिर वो हुआ, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।

इस पुलिस दस्ते को लीड कर रहे थे सैद नगली के थानाध्यक्ष नीरज कुमार. नीरज कुमार बच्चों के पास पहुंचे और उनसे बच्चों के माता-पिता के बारे में पूछा.

बच्चों ने बेहद मासूमियत से कहा कि हम दिए बेच रहे हैं, लेकिन कोई खरीद ही नहीं रहा है. जब दिए बिक जाएंगे, तो हट जाएंगे.

बच्चों ने थानाध्यक्ष नीरज कुमार को अंकल कहा और बोले कि इतनी देर से दिए बेचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन नहीं बिक रहे. हम गरीब हैं. अगर दिए नहीं बिके तो हम दिवाली कैसे मनाएंगे.

नीरज कुमार ने बिना देर किए कहा कि मुझे दिए खरीदने हैं. इसके बाद नीरज कुमार ने बच्चों से दिए खरीदे. उनको दिए खरीदता देख साथ के और भी पुलिसवालों ने दिए खरीद लिए. लेकिन दिए ज्यादा थे और खरीदार कम. इसके बाद नीरज कुमार खरीदार की जगह दुकानदार बन गए और लोगों से दिए खरीदने की अपील करने लगे. एक वर्दीधारी की दिए खरीदने की अपील काम कर गई.. देखते-देखते सारे दीये बिक गए.और दोनों बच्चे सड़क खाली करके घर निकल गए……..!

नीरज कुमार जी जैसे पुलिस वाले यदि 25% भी हो जाएँ तो पुलिस की छवि बदल जाए !
नीरज कुमार की इस मानवता को सादर नमन करते है !
#शुभरात्रि

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दीपावली की शुभकामनाएं 😊💐

मेरे सभी प्रिय मित्रों और मुझ से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

नागरिक बनिये

अजब है मेरा देश और मेरे देश के लोग ।

तरक्की सब चाहते है लेकिन सिर्फ अपनी ।

अपने स्वार्थ में कभी हमने देश के बारे में सोचा, देश की तरक्की के बारे में सोचा, शायद कभी मुश्किल से 1 या 2 बार लेकिन अपने बारे में पल-पल सोचते हैं ।

अजीब तो तब लगता है जब लोग देश को अमेरिका और जर्मनी ,जापान आदि देशों से भी बहुत ऊपर देखने का सपना संजोते है , लेकिन पान खाकर थूकते सड़क पर ही है ।

चलते हुए शौच आ जाये तो शौचालय होते हुए भी रुक कर शौच करेगा खुले में ही जहां सब आते जाते देखते है उसको

और वो फिर अपेक्षा ये भी करता है कि महिलाये ,लडकियां भी ऐसा करे ।

हमे खुद को बहुत ज्यादा बदलना होगा तभी हम कुछ कर पाएंगे देश ऐसे आगे नही जाते ।

देश को आगे लेकर जाने के लिए सोचना पड़ता हैं । आप भारत के नागरिक हो लेकिन सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने के लिए तो नागरिक सबसे पहले मानेगे लेकिन नागरिक की भूमिका कोई नही निभाना चाहता है ।।

एक जिम्मेदार नागरिक बनना होगा तभी देश भी अग्रसर होगा प्रगति पथ और निर्माण में आप सब को मुझे हम सब को मिलकर जन भागीदारी देनी होगी तभी ये कार्य हो पाएंगे ।

नागरिक बने और जिम्मेदार बने । अपने कर्तव्यों को समझे और अपनी भूमिका को देश के प्रति सक्रिय करे

धन्यवाद

श्रद्धा

मेरी उम्र यही कोई 6-7 वर्ष की रही होगी ये बात तभी की है । जब मैं रोज कभी माँ और कभी अपने पापा के साथ मंदिर जाया करता था भगवान को जल अर्पण करने के लिए । लेकिन एक दिन सुबह -सुबह नहाने के बाद मैं जैसे ही जाने लगा तो देखा कि बहुत तेज़ बारिश पड़ रही है । मैं जाने को जिद पर अड़ा रहा लेकिन कोई मुझे घर से बाहर भेजने को तैयार नही था क्योंकि बारिश इतनी तेज थी कि उस दिन मेरी माँ भी खुद जल चढ़ाने नही गयी थी । इसलिए मुझे भी नही भेजा लेकिन मैं नही माना ।

मैं मंदिर की तरफ चल दिया अपनी गली से निकल कर जो कि सिर्फ 3 या 4 फुट चौड़ी है बस । गाँव मे सड़के नही होती वहां पर खड़ंजे होते है जो ईंटो के बने होते है बस ऐसे ही था मैं जैसे ही खड़ंजे पर आया तो 2 से 3 फ़ीट पानी था खड़ंजे पर लेकिन पापा के समझाने पर भी नही माना और पापा मुझे लेकर गए मंदिर मेरे दादा जी भी खड़ंजे पर बैठे हुए अपनी छोटी से बैठक से मुझे देख रहे थे उन्होंने भी मना किया पर मैं नही माना और मंदिर पहुच ही गया ।

मैंने मन्दिर में भगवान को जल अर्पण किया और घर आया । तब की बात आज 16-17 साल बाद जब मुझे याद आती है तो अनायास ही मेरे मन मे सवाल से उठ जाते है कि

वो चीज़े आखिर क्या थी जो मैंने की

वो मेरे रोज की तरह के कार्य थे, भगवान में मेरी श्रद्धा थी बिना किसी फल की उनसे आशा किये बगैर या मेरे संस्कार थे जो मुझे मिले अपने बड़ो से जो मैंने सीख लिए थे

समझ नही पाता लेकिन ये किस्सा मुझे बहुत कुछ सिखा गया था